Monday, November 2, 2026
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आम की फसल पर मैंगो हॉपर के बढ़ते प्रकोप से सतर्क रहें किसान: डॉ. शर्मा

होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। फार्म सलाहकार सेवा केंद्र, गंगियां के सीनियर प्रसार वैज्ञानिक (कीट विज्ञान) डॉ. राकेश कुमार शर्मा ने जिले के आम उत्पादक किसानों को फरवरी और मार्च माह में मैंगो हॉपर (आम का तिड्डा) के बढ़ते प्रकोप को लेकर सतर्क रहने की अपील की है। उन्होंने कहा कि आम की फसल इस समय फूलों की अवस्था में है और ऐसे समय में यह कीट सर्वाधिक नुकसान पहुंचाता है।

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डॉ. शर्मा ने बताया कि भारत के लगभग सभी राज्यों में आम की खेती की जाती है, जबकि पंजाब में जिला होशियारपुर आम उत्पादन के लिए विशेष पहचान रखता है। फरवरी-मार्च के दौरान जब पेड़ों पर बौर आता है, तब मैंगो हॉपर बड़ी संख्या में फूलों और कोमल पत्तियों पर एकत्र होकर उनका रस चूसता है, जिससे उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।

उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष जिले के कई बागों में इस कीट का गंभीर प्रकोप देखने को मिला था, जिसके कारण किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। इसलिए समय रहते इसकी पहचान और रोकथाम अत्यंत आवश्यक है। डॉ. राकेश ने बताया कि मैंगो हॉपर के बच्चे (निम्फ) हल के फाल के आकार के होते हैं। प्रारंभिक अवस्था में इनका रंग सफेद तथा आंखें लाल होती हैं। बढ़ने पर इनका रंग पीला-हरा और बाद में हरा-भूरा हो जाता है। इसके अगले पंख पिछले पंखों से मोटे होते हैं। वर्ष में इसकी दो पीढ़ियां विकसित होती हैं—एक फरवरी से अप्रैल तथा दूसरी जून से अगस्त तक। बसंत ऋतु वाली पीढ़ी आम की फसल को अधिक नुकसान पहुंचाती है।

उन्होंने बताया कि यह कीट फूलों, कोमल पत्तियों और छोटी टहनियों का रस चूसता है। प्रभावित फूल चिपचिपे हो जाते हैं और उन पर काली फफूंदी जम जाती है, जिससे वे सूखकर गिर जाते हैं। कीट द्वारा स्रावित मीठा द्रव (हनीड्यू) पत्तियों और फलों पर कालिख जैसी परत बना देता है, जिससे प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया प्रभावित होती है। घने और कम देखभाल वाले बागों में इसका प्रकोप अधिक पाया जाता है। डॉ. शर्मा ने बताया कि सर्दियों में बाग की घनी और अनावश्यक शाखाओं की छंटाई करनी चाहिए, ताकि धूप और हवा का समुचित प्रवाह बना रहे। खेत में अनुशंसित दूरी पर ही पौधारोपण करें।

उन्होंने बताया कि प्रति एकड़ 5 लीटर पी.ए.यू. नीम या धरेक का घोल 500 लीटर पानी में मिलाकर सप्ताह के अंतराल पर दो बार छिड़काव किया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर 200 मिलीलीटर कॉन्फिडोर 17.8 एसएल (इमिडाक्लोप्रिड) या 50 ग्राम एक्टारा 25 डब्ल्यूजी (थायामेथोक्सम) 500 लीटर पानी में घोलकर 15 दिन के अंतराल पर दो बार छिड़काव करें।

डॉ. राकेश शर्मा ने बताया कि रासायनिक दवाओं का छिड़काव शाम के समय करें, जब परागण करने वाली मधुमक्खियां फूलों पर सक्रिय न हों। पहला छिड़काव नीम आधारित घोल से करना अधिक उपयुक्त रहता है।

डॉ. शर्मा ने किसानों से अपील की कि वे कृषि विशेषज्ञों की सलाह अनुसार ही दवाओं का प्रयोग करें और समय पर रोकथाम उपाय अपनाकर आम की फसल को सुरक्षित रखें, ताकि बेहतर उत्पादन सुनिश्चित किया जा सके।

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