
होशियारपुर (द स्टैर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्ग दर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि भगवान का नाम सिमरन करना ही सर्वोपरि है। नाम में वह शक्ति है जो व्यक्ति के हर कष्ट को दूर करके उसका सही मार्गदर्शन करती है। हमें जो मानव शरीर मिला है उस से हम स्वर्ग अथवा नरक जो भी चाहे प्राप्त कर सकते हैं।

आत्मा परमात्मा का अंश है तो शरीर प्रकृति का अंश है। शरीर से चाहे भक्ति कर लो चाहे दुनियावी भोग विलास कर लो। शास्त्र हमारी आंखें खोलने के लिए होते हैं। हम यह बात भूल जाते हैं कि कर्मों का फल अवश्य मिलता है। शास्त्र कहते हैं कि शरीर का सदुपयोग करो। इसी को योग कहते हैं। शास्त्रों में हर चीज का वर्णन किया गया है लेकिन दुख की बात है कि हम शास्त्र पढ़ते ही नहीं। अगर पढ़ने भी हैं तो उसकी शिक्षाओं पर मनन नहीं करते। हम में सात्विक राजसिक और तामसिक तीनों गुण होते हैं। गीता में लिखा है कि यह तीनों गुण क्या-क्या काम करते हैं। सात्विक गुणों वाले अच्छे काम करते हुए स्वर्ग की प्राप्ति कर लेते हैं जबकि राजसिक गुणों वाले सांसारिक सुख भोगते हुए फिर से संसार में आते हैं। तमोगुण वाले अधोगति को प्राप्त होते हैं।
ऐसे लोग आसुरी प्रवृत्ति वाले होते हैं। ईश्वर ने हमें शरीर प्रदान कर दिया। अब यह हम पर निर्भर करता है कि हमने उसमें किस गुण को धारण करना है। शरीर की तीन स्थितियां हैं। पहले जन्म लेना फिर बुढ़ापा आना और फिर मृत्यु को प्राप्त करना। इसमें से बुढ़ापा सबसे मुश्किल चीज है। बुढ़ापा एक बड़ी भारी बीमारी है। जन्म व मृत्यु कुछ पलों का काम है जबकि बुढ़ापा लंबा दौर चलता है। इसलिए शरीर को ठीक रखने के लिए हमें योग के साधन जरूर करने चाहिए।












