
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़): योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि भगवान के दरबार में आने से सुख और शांति प्राप्त होती है। इसीलिए प्रभु हमें योग मार्ग पर लगाते हैं। इसके दो पहलू है। कई कहते हैं कि साधन करो दूसरे कहते हैं की मन को ध्यान और समाधि द्वारा एकाग्र करो जिससे अंत:करण भी सुखी रहे। शरीर और अंतःकरण ही हमारे सुख के आधार है। इन दोनों में से किसी को भी हल्का सा भी दुख पहुंचे तो हमारा जीवन दुभर हो जाता है। इसलिए हमें चाहिए कि हम नित्य योग के साधन करें।

इसमें किसी प्रकार का आलस्य न दिखाएं। कई बार मनुष्य इधर-उधर की बातें सुनकर भटक जाता है। इसलिए वह योगिक साधनों को छोड़ देता है या साधन गलत करता है। कई बार अपनी मर्जी से ही साधन करने लग जाता है। जो अपनी मर्जी से साधन करेगा वह अपने दुख के लिए स्वयं जिम्मेवार होगा। मन की स्थिरता इससे भी महत्वपूर्ण है। हम चाहते हैं कि हम ध्यान में बैठे और मन एकाग्र हो जाए। मन बड़ा चालाक है। यह आसानी से हमारे बस में नहीं आता। मन हमारी सारी शक्तियों से ऊपर है। योग ऋषियों की विद्या है। यह संसार के लिए कोई नई विद्या नहीं है। शास्त्र में लिखा है कि शरीर की इंद्रियां बड़ी प्रबल होती हैं। इंद्रियों से आगे जो और शक्तिशाली चीज है वह मन है। बुद्धि उससे भी आगे है और शक्तिशाली है। इंद्रियां बड़ी-बड़ी तपस्या करने पर भी वश में नहीं आती। इंद्रियों से शक्तिशाली मन और उस से शक्तिशाली बुद्धि और उससे भी शक्तिशाली आत्मा है। अगर हम ध्यान लगाना चाहते हैं तो पहले हमें अपनी बुद्धि को स्थिर करना पड़ेगा। गीता के 18 अध्याय है। इनमें 6 कर्म योग के, 6 भक्ति योग के और 6 ज्ञान योग के हैं। लेकिन दुख इस बात का है कि हमारे कर्म, भक्ति और ज्ञान तीनों ही ठीक नहीं है। फिर हम शिकायत करते हैं कि हमारा मन नहीं लगता। हमारा कर्म यज्ञ रूप हो। हम कर्म करें तो केवल अपने लिए ही नहीं दूसरों के लिए भी करें। स्वार्थ के लिए किया गया कर्म हमारी बुद्धि को स्थिर नहीं करेगा। इसके अलावा हमारा कर्म निष्काम हो।
कर्म में किसी भी प्रकार की कामना ना हो। हम फल भगवान पर नहीं छोड़ते अपने ऊपर लेते हैं। जो भी कर्म करो उसे भगवान के अर्पण कर दो। बहुत सी परेशानियां हमें भक्ति के द्वारा भी हो जाती है। इसके लिए जरूरी है कि हमारी भक्ति एकनिष्ट होनी चाहिए। भगवान के जिस स्वरुप की पूजा करो उस पर पूरी निष्ठा रखो। भगवान कहते हैं कि मेरा ही ध्यान करो मेरे बारे में ही सोचो मेरी शिक्षाओं का ही पालन करो। बुद्धि अपने आप स्थिर हो जाएगी। जो जिसको याद करता हुआ जाता है अंत में उसी के पास पहुंच जाता है। भगवान कहते हैं कि जो केवल मुझे ही मानता है वह अंत में मेरे पास ही आता है। उन्होंने कहा कि ईश्वर का दूसरा नाम ही ज्ञान है। ज्ञान से ही मुक्ति मिलती है। मुक्ति से पहले मन व बुद्धि खत्म हो जाती है।












