
आज की चुटकी हम कुछ पंजाबी के आखाणों (कहें तो कहावतों) से शुरु करने जा रहे हैं और आपको बताएंगे कि किस प्रकार यह कहावतें एक सामाजिक संस्था को दोनों हाथों से लूटने वालों पर चरितार्थ हो रही हैं। जिसे पंजाबी आती हो वह इन्हें पढ़े और समझे तथा जिन्हें पंजाबी नहीं आती उन्हें हम हिन्दी में लेकिन पंजाबी लहज़े में ही समझाने का प्रयास करेंगे।

ਉਹ ਫਿਰੇ ਨੱਥ ਘੜਾਉਣ ਨੂੰ, ਉਹ ਫਿਰੇ ਨੱਕ ਵਢਾਉਣ ਨੂੰ: ਜਦ ਕੋਈ ਬੰਦਾ ਕਿਸੇ ਉੱਪਰ ਵੱਡੀਆਂ ਆਸਾਂ ਬੰਨ੍ਹ ਬੈਠਾ ਹੋਵੇ, ਪਰ ਉਹ ਅੱਗੋਂ ਉਲਟਾ ਨੁਕਸਾਨ ਕਰਨ ਤੇ ਤੁਲਿਆ ਹੋਵੇ।
ਉਜੜ ਖੇੜਾ ਤੇ ਨਾਂ ਨਬੇੜਾ – ਜਦੋਂ ਕਿਸੇ ਦਾ ਖਾਸਾ (ਅਸਲ ਰੂਪ) ਉਸ ਦੇ ਨਾਂ ’ਤੇ ਉਸ ਦੀ ਪ੍ਰਸਿੱਧੀ ਨਾਲੋਂ ਨੀਵਾਂ ਤੇ ਘਟੀਆ ਸਾਬਤ ਹੋ ਜਾਵੇ ਉਦੋਂ ਇਹ ਅਖਾਣਾ ਵਰਤਿਆ ਜਾਂਦਾ ਹੈ।
ਉਜੜੀ ਮਸੀਤ ਦੇ ਗਾਲੜ ਅਮਾਮ- ਜਦੋਂ ਭੈੜੇ ਵਾਤਾਵਰਣ ਅਤੇ ਮਾੜੇ ਆਲੇ-ਦੁਆਲੇ ਵਿੱਚ ਕਿਸੇ ਘਟੀਆ ਬੰਦੇ ਜਾਂ ਵਸਤੂ ਨੂੰ ਮਾਨਤਾ ਪ੍ਰਾਪਤ ਹੋ ਜਾਵੇ ਉਦੋਂ ਇਹ ਅਖਾਣ ਬੋਲਦੇ ਹਨ।
पंजाबी वाले तो समझ गए होंगे कि हम क्या बात करना चाहते हैं तो हिन्दी वालों को भी समझाने का प्रयास करते हैंः-
ओह फिरे नत्थ घड़ाउण नूं, ओह फिरे नक्क वडाउण नूं- जब कोई व्यक्ति किसी से अधिक आस लगाए बैठा हो और वह उल्टा नुकसान करने पर तुल जाए।
उजड़ खेड़ा ते नां नबेड़ा- जब किसी का असल रुप उसकी प्रसिद्धी से नीचा एवं घटिया साबित हो जाए तो यह अखाण (कहावत) वहां प्रयोग होता है।
उजड़़ी मसीत दे गालड़ अमाम- जब बुरे वातावरण तथा बुरे आसपास में किसी घटिया व्यक्ति या वस्तु को मान्यता प्राप्त हो जाए तो यह अखाण (कहावत) बोलते हैं।
स्टैलर चुटकी
यह अखाण इन दिनों एक सामाजिक संस्था जो कि शायद सरकारी भी कहलाती है में कुंडली जमाए बैठे कुछ लोगों पर स्टीक बैठते नज़र आ रहे हैं। इन अखाणों की इतनी स्टीकता की मैंने तो शायद ही आज तक उदाहरण कहीं देखी व सुनी हो। लेकिन यह सच है कि चंद अधिकारियों की आंखों में धूल झोंककर दोनों हाथों में लड्डू लिए कुछ लोग इस संस्था के माध्यम से खूब मालामाल हो रहे हैं और समाज सेवा के मुखौटे के भीतर छिपे असली रुप के नज़ारे लेने में कामयाब भी हो रहे हैं। उन्हें रोकने, टोकने एवं निगरानी वाला कोई नहीं। पता चला है कि जिनकी ड्यूटी पूरी निगरानी से समाज सेवा करवाना है उन्हें भी उनका बनता निवाला बाखूबी पहुंचता किया जा रहा है। अगर ऐसा न होता तो किसी की मजाल कि वह जनता के दान दिए हुए रुपयों में से एक पैसा भी इधर से ऊधर कर जाता। लेकिन हैरानी की बात है कि सरेआम दान के पैसे की लूट को खुली नज़रों से देख रहे अधिकारी न जाने किस मजबूरी में हाथ खींच अपना समय निकालकर फर्ज की इतिश्री करने में लगे हुए हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी अनुसार अगर कोई उक्त संस्था को दान देता है तो उसकी बाकायदा तौर पर रसीद काटी जाती है और उस रुपये को बैंक में जमा करवाकर एक-एक पैसे का हिसाब रखा जाता है ताकि कोई दानी सज्जन पूछ ले तो उसे बताया जा सके कि उसका पैसा कहां खर्च किया गया है। लेकिन इतनी सफाई से यहां पर गोलमाल किया जा रहा है कि बड़े-बड़े गच्चा खा जाएं। और तो और सेवा कार्य का वेतन बढ़ाकर व मनमर्जी से कथित मिलीभगत करके पोस्टें क्रिएट करके जनता के दान की लूट के दरवाजे कुछ इस प्रकार खोले जा रहे हैं कि जनता को न तो दहलीज नज़र आ रही है और न ही दरवाजा। यानि कि सफाई में माहिर लोगों के काम तो ऐसे ही होते हैं न। चर्चा है कि पिछले कुछ दिन पहले एक बड़ा आयोजन हुआ था, जिसमें लाखों का दान संस्था के पास आया था और उसमें से मोटी रकम बैंक में जमा करवानी भी जरुरी नहीं समझी गई तथा उसे बारों-बाहर ही गुप्त दान की तरह लुप्त कर दिया गया। इसके अलावा दान के पैसे जिसे कि जरुरतमंदों की सेवा के लिए उपयोग किया जाना चाहिए, उसे बड़ी सफाई के साथ अपने ऐशो आराम एवं इमारतों पर खर्च किया जा रहा है।
आप सभी तो जानते ही हैं कि आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल द्वारा शीश महल बनाए जाने के मामले ने किस प्रकार तूल पकड़ा और उनकी कुर्सी तक जाती लगी। लेकिन इस उदाहरण से बेखबर कुछ अधिकारी दान की राशि का प्रयोग शीश महल की उसारी में उड़ाकर आधुनिक एवं स्टेटस सिंबोलिक होने का प्रयास कर रहे हैं। कार्यलय ऐसा बनाया जा रहा है जो दिखने में किसी कार्पोरेट घराने के कार्यलय जैसा लगे। जिसे पैसे की बर्बादी कहा जा सकता है तथा ऐसे में संस्था को दान देने वालों के दिल पर क्या गुजरती होगी या गुजर रही होगी इसे आसानी से समझा एवं महसूस किया जा सकता है।
बताया जाता है कि एक समय था जब बड़े अधिकारियों द्वारा की जाने वाली पार्टियों का बिल संस्था के खाते, जोकि किताबों में नहीं डाला जाता था के माध्यम से दिया जाता था तथा इसका खुलासा एक समाचारपत्र द्वारा भी किया गया था। जिसके बाद कुछ दिन तो दावतें बंद रहीं, पर बाद भी फिर से शुरु हो गईं। संस्था का एक बार फिर से अच्छा समय आया और एक बड़े अधिकारी ने इसकी जिम्मेदारी उन कंधों पर डाली, जिसने लूट के दरवाजे बंद करते हुए संस्था की साख को बढ़ाने का काम किया। लेकिन उस अधिकारी में एक ही बुराई थी और वह थी, ईमानदारी के कीड़े ने उस अधिकारी को ऐसे काट रखा था कि उसने किसी की चलने नहीं दी। अब जब आप किसी को चलने नहीं दोगे तो क्या दूसरा आपको चलने देगा। तो हुआ यह कि एक बहुत बड़े षड्यंत्र के तहत एक ऐसी योजना बनाई गई कि उसे खुद ही वहां से हटना पड़ा तथा अधिकारियों द्वारा बार-बार बुलाए जाने पर भी उसने दोबारा इस तरफ मुंह नहीं किया। फिर दौर शुरु हुआ कि आखिर कुर्सी पर बैठेगा कौन । पता चला है कि एक बड़े अधिकारी ने तो इसे समाज सेवा को ही समर्पित किया था, लेकिन उसे भी अधिक दिनों तक यहां टिकने नहीं दिया गया। एक और अधिकारी आए पर उनकी भी एक न चली। आखिर सिस्टम के हिसाब से ही चलना पड़ता है।
समय आया कि बागदौड़ चाटूकारिता में निपुण लोगों के हाथ में आई और जो दरवाजे बंद हुए थे वह धीरे-धीरे खुलने लगे। एक विचार दूसरे से तो दूसरे के तीसरे से मिलने लगे तथा बड़े अधिकारियों की जी हजूरी में तिजौरी का मुंह भी खुलने लगे। अब तो शहर में चर्चा है कि उक्त संस्था में कथित तौर पर हो रहे गोलमाल यानिकि आप समझ ही गए होंगे कि क्या चल रहा है और किसकी जांच होनी चाहिए की उच्च स्तरीय जांच करके दान राशि का सदोपयोग यकीनी बनाया जाना चाहिए। अन्यथा अंधी पीसे, कुत्ता चाटे वाली कहावत चरितार्थ होते देर नहीं लगेगी।
अब देखो सवाल मत पूछना कि किस संस्था की बात हो रही है और उसमें सरकार की क्या भागीदारी है, कहां की संस्था है, किस शहर में कार्यरत है तथा कौन-कौन लोग हैं जो दान की राशि से खूब मजे.. लूट रहे हैं। देखो भाई मुझे यकीन है कि आप बहुत समझदार हैं और समझ भी गए होंगे। मेरा मुंह न ही खुलवाओ तो अच्छा है। मैं तो एक छोटा सा पत्रकार हूं और इस बुरी आत्माओं के समंदर में आपका ही सहारा है। मुझसे मेरा सहारा न छीनो और दान देने से पहले संस्था के संचालकों की कुंडली जरुर पढ़ लें। वैसे एक बात है यह लोग पैग, लैग यानि कि पका मास व कच्चे मास के भी शौकीन कुछ कम नहीं हैं। आखिर याराना है पुराना, खूब जमेगा रंग जब मिल बैठेंगे हम और तुम…। मुझे दें इजाजत। जय राम जी की।











