
होशियारपुर (द स्टैलर न्यूज़)। योग साधन आश्रम मॉडल टाउन में साप्ताहिक सत्संग के दौरान भक्तों का मार्गदर्शन करते हुए मुख्य आचार्य चंद्र मोहन जी ने कहा कि हम प्रभु की शरण में मुक्ति प्राप्त करने के लिए जाते हैं लेकिन कई बार हम दुविधा में फंस जाते हैं। कई बार हमारे सामने रुकावटें आ जाती है। कई बार हम जीवन में दोरास्ते पर खड़े हो जाते हैं और हमें पता नहीं चलता कि कौन सा रास्ता हमारे लिए सही है। एक मार्ग हमें भगवान की तरफ ले जाता है और एक मार्ग हमें संसार की तरफ आकर्षित करता है। हम सोचते रहते हैं किधर जाएं और कई बार इसी बात में जीवन बीत जाता है। हमें निर्णय लेना होगा कि हम उस मार्ग पर चलें जो हमें भगवान की तरफ ले जाता है।

भगवान का मार्ग योग का मार्ग है। यह सबसे प्राचीन मार्ग है और संसार के सभी मार्गों से अलग है। प्रभु रामलाल जी हमें योग का मार्ग दिखला रहे हैं। वह कलयुग के अवतार है। योग का मार्ग वैदिक मार्ग है जो सदियों से चला आ रहा है और उसमें कोई संशय नहीं है। इसके आठ अंग है और पहला अंग तो इसकी नींव है। यह यम और नियम है। यह दोनों पांच पांच है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और ईश्वर प्रणिधान इस के अंग है। शौच संतोष तप स्वाध्याय इनमें सभी सूक्ष्म है लेकिन स्वाध्याय स्थूल है। हमारा लक्ष्य ईश्वर की प्राप्ति है और स्वाध्याय उसकी एक सीढ़ी है। आज हमारा समाज स्वाध्याय नहीं करता इसीलिए भटकता है। स्वाध्याय का अर्थ है किसी ग्रंथ का पाठ करना। इसमें सबसे बड़ी कठिनाई भाषा की है कि हम पड़े क्या। हमें पता नहीं चलता कि हम कौन सा ग्रंथ पड़े। अगर हम गीता को अंग्रेजी में पड़ेंगे तो उसमें आनंद की अनुभूति नहीं होगी। स्वाध्याय से ईश्वर का मिलन हो जाएगा। अब यह प्रश्न आता है कि ईश्वर कौन है और ग्रंथ कौन सा है। कहा जाता है कि धर्म का आधार गुरु है। गुरु के बिना ना ईश्वर का पता चलेगा ना ग्रंथ का पता चलेगा। ग्रंथ और ईश्वर में चोली दामन का संबंध है। हर एक ग्रंथ ईश्वर के किसी न किसी रूप को दर्शाता है। ग्रंथ पढ़ने से हमें पता चलेगा कि हमने करना क्या है। स्वाध्याय से हमारा मन ईश्वर में लगने लगेगा और हमारा जीवन सुधरने लगेगा। इससे मन की एकाग्रता होगी।











