नगर निगम: रिश्वत के लिए “ऑबजैक्शन” का नुक्ता, विजीलैंस की कार्यवाही के बावजूद सीधी नहीं हुईं टेढ़ी ………..

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होशियारपुर नगर निगम की बिल्डिंग ब्रांच में फैला भ्रष्टाचार किसी से छिपा नहीं है। मीडिया द्वारा बार-बार इस मुद्दे को उठाए जाने के बावजूद भ्रष्टाचार में लिप्त कर्मचारी सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। हाल ही में कुछ दिन पहले ही एक शिकायत के आधार पर विजीलैंस द्वारा एक इंस्पैक्टर को रिश्वत मामले में गिरफ्तार किया गया और इसके साथ ही एक आर्टिटैक्ट को भी काबू किया गया। विजीलैंस की कार्यवाही के बाद यह कयास लगाए जा रहे थे कि निगम में अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। लेकिन कयास लगाने वाले भूल गए थे कि जिनकी रगों में रिश्वत का खून दौडऩे लगता है वे पूंछें सीधी होने वाली नहीं हैं। अब सूत्रों से प्राप्त जानकारी की बात करें तो रिश्वत के खेल में “ऑबजैक्शन” नाम का नुक्ता बहुत काम करता है। अब आप सोच रहे होंगे कि ऑबजैक्शन का नुक्ता, अब किसी के दस्तावेज में कमी होगी तो ऑबजैक्शन तो लगेगा ही न। जी! बिलकुल ठीक, आपने ठीक ही सोचा व समझा। लेकिन इसी ऑबजैक्शन के खेल से शुरु होता है रिश्वत का खेल।

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जब भी कोई बिल्डिंग ब्रांच में अपने घर या दुकान व अन्य व्यापारिक प्रतिष्ठान का नक्शा पास करवाने के लिए फाइल जमा करवाता है तो उसकी फाइल चैक करते समय एक बार में ही सारे ऑबजैक्शन नहीं लगा दिए जाते। बल्कि बार-बार ऑबजैक्शन-ऑबजैक्शन और ऑबजैक्शन लगाकर लोगों को तंग परेशान किए जाने का खेल शुरु हो जाता है ताकि वो दफ्तर के चक्कर मारने के स्थान पर काम करवाने का ढंग खोजने लगे। खोजते-खोजते वह ऐसे आदमी के पास पहुंच जाता है जो अंदर के सारे दांव पेंच जानता है और काम करवाने की एवज में अंदर कितना और उसका कितना सारा दाम तय करके काम करवाने की हामी भर देता है। इतना ही नहीं अगर कोई आर्टिटैक्ट ऑबजैक्शन लगाने वाले से बात करता है कि इसमें तो कोई कमी नहीं व सारा नक्शा नियमों के तहत ही बनाया गया है तो अधिकारी या क्लर्क उसे ऐसा नियमों का पाठ पढ़ाते हैं कि बैचारा यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि कहीं साहिब उसका लाइसेंस ही न कैंसल करवा दें। अगर ऐसा होता है तो वह बेरोजगार हो जाएगा।

इसी डर से कोई भी आर्टिटैक्ट खुलकर बोलने को तैयार नहीं और न ही वह इसका विरोध कहीं दर्ज करवा पाता है। डरे भी क्यों न भाई, आखिर साहिब के हाथ में सरकार द्वारा सौंपी गई ताकत और कलम जो है। अगर साहिब ने गुस्से में दो शब्द लिख दिए तो…। अब ऑबजैक्शन से तंग लोग जब फाइल का भार बढ़ाने के लिए उसके साथ हरे-हरे व नीले-नीले नोटों की खनक रख देते हैं तो फाइल के सारे ऑबजैक्शन दूर हो जाते हैं तथा नक्शा पास हुए बिना ही उसे काम शुरु करवाने की बात कह दी जाती है। अब ये ऑबजैक्शन लगाता कौन है और किसके कहने पर लगता है तथा जो भार फाइल के साथ आता है उसमें किस-किस का हिस्सा होता है, का सारा खेल जांच का विषय है। पिछले दिनों विजीलैंस ने एक शिकायत पर कार्यवाही करते हुए रिश्वत के मामले में एक इंस्पैक्टर व एक आर्टिटैक्ट को काबू किया था।

अब सवाल यह पैदा होता है कि आखिर रिश्वत देने के लिए व काम करवाने का हल खोजने के लिए शिकायतकर्ता को किसने मजबूर किया और जो माध्यम बना उसका क्या कसूर था। हालांकि पता चला है कि शिकायतकर्ता आर्टिटैक्ट के साथ खड़ा है तथा उसका कहना है कि इस सारे घटनाक्रम में आर्टिटैक्ट का कोई कसूर नहीं तथा सारा कसूर उसे रिश्वत देने के लिए मजबूर करने वाले कर्मियों का है। खैर अब यह मामला माननीय अदालत में है तथा शिकायतकर्ता व आर्टिटैक्ट को विश्वास है कि उन्हें इंसाफ जरुर मिलेगा और रिश्वतखोर सलाखों के पीछे अपने पापों को भोगेंगे। अब देखना यह होगा कि बिल्डिंग ब्रांच में फैले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए सरकार व जिला प्रशासन की तरफ से क्या कदम उठाए जाते हैं। क्या? हवा में लिख दिया सारा कुछ। अरे भाई विजीलैंस की कार्यवाही के बाद भी कई लोगों ने फाइल का भार बढ़ाकर नक्शे पास जो करवाए हैं और वे इसलिए खुलकर सामने नहीं आ रहे कि कहीं भविष्य में उनके लिए कोई समस्या न खड़ी कर दी जाए। वैसे ऐसे लोग सरकार की छवि को भी धूमिल करने का काम कर रहे हैं क्योंकि सरकार का रुख भ्रष्टाचार व भ्रष्टाचारियों पर काफी सख्त है। अब भाई चुटकी उसी की लगती है जिसकी चर्चा होती है तथा अब यह भी जांच का विषय है कि बार-बार ऑबजैक्शन क्यों लगाया जाता है और कौन है इस ऑबजैक्शन के पीछे का मास्टर माइंड, जिसकी कलम पर नाच रहे हैं सभी। जो चर्चा थी वो आपसे सांझा कर ली। अब आप नहीं समझना चाहते तो आपकी मर्जी। मैं तो चला। जय राम जी की।

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